Wednesday, July 28, 2010

पंचायतों का न्याय

पंच भगवान होता था। अब जबकि भगवान की ही कोई इज्जत नहीं रही तो पंचों की क्या बिसात। बचपन में मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी पढ़ी थी ‘पंच परमेश्वर’। पंच की गद्दी पर बैठते ही किस तरह से व्यक्ति का हृदयपरिवर्तन हो जाता है, इसका बड़ा खूबसूरत चित्रण इस कहानी में किया गया था। दरअसल दो घड़ी के लिए मिलने वाली यह इज्जत लोगों के मन पर गहरी लकीरें खींचती थी। वे इस पर खरा उतरने की कोशिश भी करते थे। इसके अलावा ईश्वर का खौफ था, पाप का बोध था, नर्क का भय था। सबका सामूहिक निचोड़ यह था कि जिसे पंच कह दिया वह वास्तव में भगवान बन कर दिखाने की कोशिश करता था। अब जबकि ईश्वर, पाप और नर्क का भय पूरी तरह से समाप्त हो चुका है, पैसा और प्रभाव ताकत का पर्यायवाची बन चुके हैं, तब क्या तो पंचायत और क्या ही पुलिस। अब पंचायतें प्रताड़ित करने का, अपने मन की कुण्ठाओं और विकृतियों को मूर्तरूप देने का जरिया बन गयी हैं। जवान विधवा पर नजरें मैली कीं। मान गयी तो ठीक और फटकार दिया तो टोनही होने का लांछन लगाकर गांव से निकाल दिया। इतने पर भी नहीं मानी तो सार्वजनिक रूप से उसकी इज्जत उछाल दी या फिर पीट-पीट कर मारने का आदेश सुना दिया। महिला टोनही हो सकती है किन्तु पुरुष टोनहा नहीं हो सकता। क्यों? कभी किसी पुरुष को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाने का आदेश किसी पंचायत ने दिया हो, ऐसा सुनने या पढ़ने में नहीं आया। अलबत्ता महिलाओं के लिए ऐसे आदेशों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त मिल जाएगी। कपड़े नोंच लेना, मलमूत्र खिलाना, सामूहिक बलात्कार करना आदि के अपने फरमानों के जरिए पंचायतें अपनी यौन कुंठाओं को जी रही हैं। पंच अब परमेश्वर नहीं रहे। वे जमीन पर उतर आए हैं। अब वे न्याय के लिए नहीं, अपने लिए, अपने परिजनों के लिए, अपनी पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। कहने को तो 24 अप्रैल 1993 को संविधान का 73वां संशोधन कर शासन की जिम्मेदारी त्रिस्तरीय पंचायतों को सौंप दी गई। 600 जिला पंचायतों, 600 माध्यमिक पंचायतों तथा 2 लाख 30 हजार ग्राम पंचायतों के जरिये 28 लाख प्रतिनिधि हमारे लोकतंत्र का हिस्सा बन गये। 33 प्रतिशत आरक्षण से करीब 10 लाख महिलायें पंचायत प्रतिनिधि बन गई और 50 प्रतिशत आरक्षण होने पर उनकी संख्या 14 लाख तक बढ़ सकती है। किन्तु वास्तविकता के धरातल पर स्थिति विचित्र है। पंचायतों में पंच पतियों, पंच भाईयों, पंच पिताओं का बोलबाला है। देहात को छोड़ भी दें तो शहरी निकायों का यह हाल है कि पार्षद पति बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं। गाड़ियों के नम्बर प्लेट पर शान से पार्षद पति, महापौर पति लिख रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का यह कहना कि पंचायतों के प्रभावी होने से नक्सलवाद खत्म हो सकता है, दूर की कौड़ी लगती है। स्वप्नदृष्टा होने में और सपने देखने में फर्क होता है। एक मौजूदा हालातों के आधार पर आने वाले समय की कल्पना करता है। दूसरा हालातों को झुठला कर सुखद कल्पनाओं में खोया रहता है। क्या उन्हें नहीं पता कि पंचायतों का नया संस्करण सरकारी ढांचे का एक्सटेंशन मात्र है। वे गांव की अच्छाइयों को उभार कर शहर लाने नहीं बल्कि शहर की गन्दगी को गांव तक पहुंचाने गए हैं।
Posted by deepakdas at 2:26 PM

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